आईओके® फ़ोकस

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भारत की ह्युमेन डवलपमैण्ट इन्डैक्स {(एचडीआई रैंकिंग) मानव विकास सूचकांक} चुनौती की गंभीरता समझने के लिए इन तीन तथ्यों पर ध्यान दें:

  1. शिक्षा मंत्रालय के अनुसार, भारत में 70,018 कॉलेज और स्टैंडअलोन उच्च शिक्षा संस्थान हैं। जिनसे 2021–22 में 1 करोड़ 7 लाख छात्रों ने डिग्री और डिप्लोमा प्राप्त किए।
  2. आय वर्ष 2023–24 में, भारत में 3 करोड़ 56 लाख 52 हज़ार 226 ऐसे नौकरी पैशा लोग थे, जिनकी वार्षिक आय ₹1.5 लाख से ₹500 करोड़ के बीच थी। यदि इसे औसतन 36 वर्षों के कार्यजीवन में बाँटें, तो हर वर्ष केवल 9 90 340 ऐसे करियर अवसर बनते हैं जो सम्मानजनक और टिकाऊ आय दे पाते हैं।
  3. इसका सीधा अर्थ यह है कि हर संस्थान हर साल औसतन 15 से भी कम युवाओं के प्लेसमेंट में सफल होता है—बाक़ी के लिए डिग्री तो होती है, पर भविष्य?
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यह अंतर केवल शिक्षा का संकट नहीं है—यह HDI का संकट है।

जब करियर सम्मानजनक आय नहीं दे पाते, तो स्वास्थ्य-अवधि (हैल्थस्पान) घटती है, आर्थिक तनाव बढ़ता है, जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ तेज़ होती हैं, और परिवार कमज़ोर आर्थिक चक्रों में फँसे रहते हैं।

IoK® Education इसी अंतर को पाटने के लिए अस्तित्व में है:

  1. डिग्री बाँटने से आगे बढ़कर करियर परिणामों पर ध्यान देने के लिए,
  2. अनिश्चित रोजगार की जगह गर्व के साथ कमाई देने के लिए,
  3. और इलाज-निर्भर जीवन से निकलकर लंबा, स्वस्थ और आत्मनिर्भर जीवन बनाने के लिए।

करियर ही स्वास्थ्य-अवधि का इंजन है।

स्वास्थ्य-अवधि ही HDI की नींव है।

और शिक्षा की असली पहचान प्रमाणपत्र नहीं—परिणाम हैं।


परिदृश्य 1 - सकारात्मक प्रभाव:

मान लीजिए कि किसी देश में जहाँ औसत जीवन प्रत्याशा 72 वर्ष है, 32 लोग अपने 72वें जन्मदिन के बाद भी जीवित रहते हैं और अपना 73वाँ जन्मदिन देखने तक जीवित रहते हैं। केवल 32 व्यक्तियों के जीवन में यह छोटा सा विस्तार देश की मानव विकास सूचकांक (एचडीआई रैंकिंग) को सकारात्मक रूप से ऊपर उठा सकता है।

परिदृश्य 2 - जोखिम:

इसके बजाय, यदि उसी देश में 32 लोग अपने 72वें जन्मदिन से पहले ही मर जाते हैं, तो देश का मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) गिर जाएगा।

हमारा हस्तक्षेप - IoK® फ़ोकस

सामान्य आबादी की जगह, हमारा कार्य "कार्यशील आयु वर्ग (25-55 वर्ष)" के व्यक्तियों पर केंद्रित है, जहाँ औसत आयु लगभग 40 वर्ष हो सकती है।

परिदृश्य 3 - 40 वर्ष की आयु में एक जीवन बचाना:

यदि हम 40 वर्ष की आयु में एक व्यक्ति की अकाल मृत्यु को भी रोकने में सक्षम होते हैं, तो देश के मानव विकास सूचकांक (HDI) पर इसका सकारात्मक प्रभाव 72 वर्ष की आयु के बाद 32 व्यक्तियों के जीवित रहने के बराबर होगा।

परिदृश्य 4 - यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है:

40 वर्ष की आयु में हमारे द्वारा बचाया गया प्रत्येक जीवन भारत के मानव विकास सूचकांक में उतना ही योगदान देता है, जितना कि 71 वर्ष की आयु के 32 जीवन बचाना।

संक्षेप में: 

40 वर्ष की आयु का 1 जीवन बचाना = 71 वर्ष की आयु के 32 जीवन बचाना।

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क्या हमें मालूम है की पूरी दुनिया में आबादी के मामले में कौन सा देश एक नंबर पर है?

तो ऐसे देश का नाम भारत ही है।

भारत में हर साल 1 करोड़ से ज़्यादा स्नातक नौकरी के लिए तैयार होते हैं।

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सूचना स्रोत: https://cdnbbsr.s3waas.gov.in/s392049debbe566ca5782a3045cf300a3c/uploads/2024/02/20240214825688998.pdf

अभी यहां चीन से ज़्यादा स्नातक हैं। उच्च शिक्षा में 2020-21 के 4.14 करोड़ से बढ़कर 2021-22 में कुल नामांकन लगभग 4.33 करोड़ हो गया है।
और यह दुनिया का अकेला ऐसा देश है जहाँ 21 वर्ष और उससे अधिक आयु के स्नातक या समकक्ष डिग्री वाले लोगों की संख्या 2025-26 में 13 करोड़ से अधिक है। 


अभी मुझे आप बताएं, पूरी दुनिया में ऐसे कितने देश हैं, जो अपनी पूरी ताकत लगाकर; अगले 10 साल में हमें पछाड सकते हैं, इस मामले में?


Salary Income AY2023-24

सूचना स्रोत: https://incometaxindia.gov.in/Documents/Direct%20Tax%20Data/Approved-version-Income-Tax-Return-Statistics-for-the-AY-2023-24.pdf

  1. हमें इसके साथ ही यह कड़वी सच्चाई भी जान लेनी है, कि हमारी नौकरी पैशा आबादी की औसत सालाना कमाई 9 लाख 28 हजार ही है।
  2. और सब नौकरी पैशा लोगों की कुल संख्या 3 करोड़ 80 लाख से भी कम है। जबकि साड़े तीन लाख सालाना या इससे ज्यादा कमाने वालों की संख्या 2,95,64,831 यानि तीन करोड़ से भी कम ही है।
  3. अगर एक नौकरीपेशा व्यक्ति औसतन (58 से 62 की उम्र तक) 38 साल काम करता है,
  4. तो आज की कुल नौकरीपेशा आबादी को 38 से भाग देने पर पूरे देश में हर साल नई नौकरियाँ पाने वाले 10 लाख से कम (9,99,074) ही रहने वाले हैं।
  5. हर साल ग्रेजुएट होने वाले बाकी 97 लाख से ज्यादा,यानि 2026 में बाकी बचे 10+ करोड़ 10CrJobSeeker (पहली पीढ़ी के) स्नातक; जो दुनिया के 217 देशों की आबादी से भी ज्यादा हैं, यदि पुरानी चूहा-दौड़ में लगे रहे, तो भविष्य क्या होगा; यह सोचने लायक भी है क्या? 


मानव विकास सूचकांक (HDI) क्या है?

मानव विकास सूचकांक (Human Development Index – HDI) संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) द्वारा बनाया गया एक संयुक्त सूचकांक (composite index) है, जो किसी देश के मानव विकास स्तर को मापता है।
यह केवल आर्थिक उत्पादन (GDP) पर नहीं, बल्कि मानव जीवन की गुणवत्ता पर केंद्रित है।

HDI तीन प्रमुख आयामों (dimensions) पर आधारित होता है:

जीवन प्रत्याशा (Life Expectancy at Birth) →
लोग औसतन कितने वर्षों तक जीवित रहते हैं — यानी देश के नागरिकों का स्वास्थ्य स्तर।

शिक्षा (Education) →
इसमें दो पहलू शामिल होते हैं:

औसत शिक्षा वर्ष (Mean Years of Schooling)

अपेक्षित शिक्षा वर्ष (Expected Years of Schooling)

जीवन स्तर (Standard of Living) →
इसे प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय (GNI per capita) से मापा जाता है (क्रय शक्ति समानता PPP के अनुसार)।


यह कैसे मापा जाता है?

प्रत्येक आयाम का एक “सामान्यीकृत सूचकांक (normalized index)” बनाया जाता है — यानी 0 और 1 के बीच एक संख्या।
फिर इन तीनों सूचकांकों का ज्यामितीय माध्य (geometric mean) लिया जाता है:

HDI=(I Health​×I Education​×I Income​)1/3

जहाँ

  • Health​ = जीवन प्रत्याशा सूचकांक
  • Education​ = शिक्षा सूचकांक
  • Income = आय सूचकांक

“यदि उसी देश में 32 लोग अपने 72वें जन्मदिन से पहले ही मर जाते हैं, तो देश का मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) गिर जाएगा।”

यह कथन पूरी तरह सही दिशा में है, और इसे इस प्रकार समझा जा सकता है:

 "72वें जन्मदिन से पहले मरना" का क्या अर्थ है?

इसका मतलब है कि देश में औसत जीवन प्रत्याशा (life expectancy) घट रही है।
यदि बड़ी संख्या में लोग 72 वर्ष की आयु तक नहीं पहुँच पा रहे हैं, तो औसतन सभी नागरिकों की आयु का मान घटेगा।

इसका असर किस घटक पर पड़ेगा?

यह सीधे स्वास्थ्य घटक (Health Index) को प्रभावित करेगा।
HDI का पहला घटक — “एक लंबा और स्वस्थ जीवन” — जीवन प्रत्याशा पर निर्भर है।
जीवन प्रत्याशा में थोड़ी भी कमी आने पर स्वास्थ्य सूचकांक घट जाता है।

चूंकि HDI तीनों सूचकांकों का ज्यामितीय माध्य है:

यदि किसी एक घटक (जैसे Health Index) में गिरावट आती है,
तो पूरा HDI भी घट जाएगा, भले ही शिक्षा या आय के मान स्थिर रहें।

उदाहरण के रूप में:

मान लीजिए किसी देश का

स्वास्थ्य सूचकांक = 0.85

शिक्षा सूचकांक = 0.70

आय सूचकांक = 0.75

तो

HDI=(0.85×0.70×0.75)1/3=0.76

अब यदि जीवन प्रत्याशा गिरने से स्वास्थ्य सूचकांक घटकर 0.80 रह जाए, तो

HDI=(0.80×0.70×0.75)1/3=0.74

यहाँ HDI में गिरावट आ गई — यानी देश का समग्र मानव विकास थोड़ा कम हुआ।


सारांश:

घटक

सूचक

जब लोग 72 वर्ष से पहले मरते हैं तो असर

स्वास्थ्य

जीवन प्रत्याशा

घटती है

शिक्षा

औसत/अपेक्षित शिक्षा वर्ष

अप्रभावित

आय

प्रति व्यक्ति GNI

अप्रभावित या हल्का असर

कुल HDI

तीनों का ज्यामितीय माध्य

गिर जाता है


निष्कर्ष:

जब किसी देश में बड़ी संख्या में लोग 72 वर्ष की आयु से पहले मर जाते हैं, तो
➡ औसत जीवन प्रत्याशा घटती है,
➡ स्वास्थ्य सूचकांक नीचे आता है,
➡ और परिणामस्वरूप देश का मानव विकास सूचकांक (HDI) भी गिर जाता है।


10 करोड़ खामोश ख़्वाब—भीड़ में गुम एक नाम,
काग़ज़ की डिग्री, मगर ख़ाली हाथ—वक़्त का भारी दाम।

 

बरसों की थ्योरी थका रही, राह फिर भी धुंधली ही रही,
इंतज़ार का वज़न ढोते-ढोते, पहचान भी कहीं खो रही।

 

अब दिखती है एक राह, महिने भर में साफ़ उजाला,
जहाँ मक़सद से मेहनत मिले, सीख बने निवाला।

 

एक महीना, एक दिशा—हुनर बनती आवाज़,
क़दम ज़मीन पर, पर बनता है पेशे का ताज।

 

उम्र सिर्फ लंबी नहीं—बेहतर ज़िंदगी, भी यहीं,
अनजान राह, पर दिशा सही, बना रही मृत्युंजयी

 

लालच की दुनिया में इंसानियत की गरिमा का मान,
कारोबारी दुनिया में भी, गढ़े इंसानी पहचान।

 

अगर तुम वेतन से आगे, असर की तलाश में हो,
अगर सीख से आगे, समृद्ध जीवन की आस में हो।

 

तो इंतज़ार छोड़ो, मिशन अपनाओ,
तीस दिन सीखो, उम्रभर कमाओ।

 

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